Delhi Excise Policy Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित शराब नीति घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में AAP के शीर्ष नेताओं- अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को अंतिम अवसर दिया है। अदालत ने इन तीनों नेताओं को सीबीआई की उस याचिका पर दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें निचली अदालत द्वारा उन्हें बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। सीबीआई की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से जल्द से जल्द सुनवाई करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि इन नेताओं को पहले भी जवाब दाखिल करने के कई मौके दिए जा चुके हैं, जिसके कारण इस मामले की कार्यवाही में पहले ही काफी देरी हो चुकी है। इस पर कोर्ट ने साफ किया कि न्याय के सिद्धांतों को देखते हुए यह जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका है।
वकीलों की हड़ताल के कारण टली सुनवाई, अगस्त में होगी अगली बहस
Delhi Excise Policy Case: जस्टिस मनोज जैन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई को टाल दिया है, क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट के वकीलों के कार्य बहिष्कार (हड़ताल) के कारण बरी किए गए आरोपियों की तरफ से कोई भी वकील अदालत में उपस्थित नहीं हो सका। दरअसल, दिल्ली की जिला अदालतों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र को 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में वकील 14 जुलाई से हड़ताल पर हैं। अब इस मामले में सीबीआई की दलीलें सुनने के लिए कोर्ट ने 17 और 18 अगस्त की तारीख तय की है। सॉलिसिटर जनरल ने जुलाई के अंत या अगस्त की शुरुआत की कोई तारीख देने का अनुरोध किया था, लेकिन जस्टिस मनोज जैन ने असमर्थता जताते हुए कहा कि उनके पास पहले से ही सांसदों और विधायकों से जुड़े कई मामले लंबित हैं, हालांकि उन्होंने इस तारीख को पहले करने की संभावनाओं पर विचार करने का भरोसा दिया है।
निचली अदालत से बरी होने से लेकर हाईकोर्ट की अवमानना तक का सफर
Delhi Excise Policy Case: इस पूरे विवाद की शुरुआत इसी साल 27 फरवरी 2026 को हुई थी, जब दिल्ली की एक निचली अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को शराब नीति मामले में बरी कर दिया था। इसके बाद, 9 मार्च 2026 को सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान नया विवाद तब खड़ा हुआ जब आप नेताओं ने जज पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए केस से हटने की मांग की और सुनवाई में शामिल होने के बजाय ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ का रास्ता अपनाने की बात कही। इन नेताओं के सोशल मीडिया पोस्ट्स को कोर्ट की अवमानना मानते हुए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई और बाद में इस मामले को जस्टिस मनोज जैन की पीठ को ट्रांसफर कर दिया गया।







