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BJP की ‘नवीन टीम’ में स्मृति ईरानी का सियासी कमबैक…, क्या बनेंगी अगली सुषमा स्वराज? भाजपा ने 2027 के लिए चला मास्टरस्ट्रोक

Smriti Irani

Smriti Irani: स्मृति ईरानी की भारतीय जनता पार्टी (BJP) के केंद्रीय संगठन में राष्ट्रीय महासचिव के रूप में एक बार फिर धमाकेदार वापसी हुई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभार सौंपा गया है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से मिली हार और केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद, कई विश्लेषक मान रहे थे कि स्मृति का राजनीतिक ग्राफ गिर रहा है। लेकिन इस ताजा नियुक्ति ने यह साबित कर दिया है कि वे राजनीति के मैदान में एक लंबी रेस की खिलाड़ी हैं और उनकी यह वापसी उनके राजनीतिक कद को एक नए स्तर पर ले जाती है। इस बड़ी वापसी के साथ ही राजनीतिक गलियारों में एक पुरानी बहस फिर से तेज हो गई है। क्या स्मृति ईरानी भाजपा की अगली ‘सुषमा स्वराज’ बनने की राह पर हैं?

स्मृति ईरानी (Smriti Irani) की ‘पॉवर’ में वापसी: क्यों है यह इतनी खास?

2024 की चुनावी शिकस्त के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ अब नीचे जाएगा, और इसी बीच 2025 में उन्होंने अपने आइकॉनिक टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2.0’ से छोटे पर्दे पर वापसी भी की थी। लेकिन अगस्त 2026 में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ‘टीम बीजेपी 3.0’ ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव जैसी अहम भूमिका सौंपकर यह साफ कर दिया कि पार्टी के ‘वॉर रूम’ में उनकी जरूरत खत्म नहीं हुई है।

  • उत्तर प्रदेश 2027 के लिए बड़ा दांव- बीजेपी ने स्मृति ईरानी (Smriti Irani) को संगठन में पद देने के साथ ही उत्तर प्रदेश का संगठनात्मक प्रभार या विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। उत्तर प्रदेश में पार्टी अपने कोर वोट बैंक और खास तौर पर महिला मतदाताओं को एकजुट करना चाहती है। स्मृति ईरानी की महिलाओं के बीच जबरदस्त लोकप्रियता है। वे ‘टीम बीजेपी 3.0’ के शीर्ष नेतृत्व में शामिल इकलौती महिला राष्ट्रीय महासचिव हैं, जो उन्हें आधी आबादी की आवाज के तौर पर पेश करता है। वहीं, स्मृति ईरानी की आक्रामक छवि और जमीनी पकड़ का इस्तेमाल पार्टी सूबे में सपा-कांग्रेस गठबंधन की काट के लिए करेगी।
  • ‘जायंट किलर’ की ब्रांड वैल्यू- भले ही स्मृति ईरानी (Smriti Irani) 2024 का चुनाव हार गईं, लेकिन 2019 में कांग्रेस के गढ़ अमेठी में राहुल गांधी को पटखनी देने वाली उनकी ‘जायंट किलर’ की छवि आज भी बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश भरती है। पार्टी इस छवि और उनकी रणनीतिक सांगठनिक क्षमता का फायदा देश के अन्य राज्यों के चुनावों में भी उठाना चाहती है।

क्या स्मृति ईरानी अगली ‘सुषमा स्वराज’ हैं?

बीजेपी के इतिहास में दिवंगत नेता सुषमा स्वराज का स्थान एक बेहद कद्दावर, वाकपटु, सर्वमान्य और बेहद लोकप्रिय महिला नेता के रूप में रहा है। स्मृति ईरानी की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषक अक्सर उनकी तुलना सुषमा जी से करते हैं। दोनों नेताओं के सफर में कुछ गजब की समानताएं हैं, तो कुछ गहरे अंतर भी हैं।

  • प्रखर वक्तृत्व शैली और भाषा पर पकड़- सुषमा स्वराज अपनी ओजस्वी और तर्कपूर्ण भाषण कला के लिए जानी जाती थीं। चाहे संसद हो या संयुक्त राष्ट्र (UN), उनकी हिंदी और अंग्रेजी दोनों पर समान पकड़ थी। स्मृति ईरानी (Smriti Irani) भी वर्तमान समय में भाजपा की सबसे बेहतरीन वक्ताओं में से एक हैं। वे संसद के भीतर और बाहर जिस आक्रामकता, स्पष्टता और तथ्यों के साथ विपक्ष को घेरती हैं, वह शैली काफी हद तक सुषमा स्वराज की याद दिलाती है।
  • गांधी परिवार को सीधी चुनौती- जिस प्रकार सुषमा स्वराज ने 1999 में बेल्लारी (कर्नाटक) जाकर विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया गांधी को ललकारा था, ठीक उसी तरह स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग अमेठी में पैर जमाए और अंततः राहुल गांधी को चुनाव हराया। सुषमा जी ने बेल्लारी (कर्नाटक) जाकर कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हालांकि वे चुनाव हार गईं, लेकिन उन्होंने वहां कड़ी टक्कर देकर दक्षिण में भाजपा के पैर जमाने की नींव रखी थी। स्मृति ने भी यही जोखिम उठाया। वे 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी उतरीं। पहली बार में वे हारीं, लेकिन उन्होंने क्षेत्र नहीं छोड़ा। 5 साल लगातार मेहनत की और 2019 में इतिहास रचते हुए गांधी परिवार के इस सबसे मजबूत किले को ढहा दिया
  • आम जनता और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव- सुषमा स्वराज जब विदेश मंत्री थीं, तो ट्विटर (अब X) के माध्यम से संकट में फंसे भारतीयों की मदद के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहती थीं। उनकी इसी संवेदनशीलता ने उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर लोकप्रिय बनाया। इसी तरह स्मृति ईरानी (Smriti Irani) भी अमेठी की हार के बावजूद वहां के कार्यकर्ताओं और आम लोगों के संपर्क में रहीं। वे जमीन से उठकर आई नेता हैं, इसलिए संगठन में नीचे तक उनकी मजबूत पकड़ है।
  • संगठन से सरकार तक का सफर- दोनों ने ही बहुत कम उम्र में संगठन (महिला मोर्चा प्रमुख) से लेकर केंद्रीय कैबिनेट मंत्रालयों (जैसे कपड़ा, मानव संसाधन, महिला एवं बाल विकास) तक का सफर तय किया। सुषमा जी की तरह स्मृति ईरानी भी कई भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगाली) पर मजबूत पकड़ रखती हैं, जिससे वे देश के किसी भी हिस्से में पार्टी का चेहरा बन सकती हैं।

समानताओं के बावजूद दोनों नेताओं की राजनीति, पृष्ठभूमि और स्वभाव में कुछ बुनियादी अंतर भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

  • स्वीकार्यता का दायरा- सुषमा स्वराज के संबंध विपक्ष के नेताओं के साथ भी बेहद मधुर थे। वे सदन में जितनी तीखी बहस करती थीं, सदन के बाहर उतनी ही आदरणीय थीं। सुषमा स्वराज अपने विरोधियों के प्रति भी बेहद नरम और ‘मदरली फिगर’ के रूप में जानी जाती थीं। सुषमा स्वराज एक सर्वमान्य नेता थीं, जिनका सम्मान विपक्ष के नेता भी खुलकर करते थे। दूसरी ओर, स्मृति ईरानी (Smriti Irani) की छवि अधिक आक्रामक और फ्रंट-फुट पर खेलने वाली नेता की है। विपक्ष उन्हें लेकर अधिक आक्रामक रहता है और उनके बयान अक्सर बड़े राजनीतिक विवादों का केंद्र बन जाते हैं।
  • संगठनात्मक यात्रा- सुषमा स्वराज पारंपरिक रूप से संघ और छात्र राजनीति (ABVP) के रास्तों से होकर आईं। वहीं स्मृति ईरानी ने टेलीविजन की दुनिया (तुलसी वीरानी के रूप में प्रसिद्धि) को छोड़कर साल 2003 में भाजपा की सदस्यता ली और अपनी कार्यक्षमता के दम पर बेहद कम समय में राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई।

‘टीम बीजेपी 3.0’ में स्मृति ईरानी की भावी राह

नितिन नबीन की टीम में शामिल होकर स्मृति ईरानी (Smriti Irani) ने अपने राजनीतिक करियर का एक नया और बेहद महत्वपूर्ण अध्याय शुरू किया है। उनकी इस वापसी से साफ है कि बीजेपी में उनका कद आने वाले समय में और बढ़ेगा।

  • 2027 और 2029 की चुनावी बिसात- राष्ट्रीय महासचिव के रूप में वे केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि आगामी कई राज्यों के चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी की मुख्य रणनीतिकार और स्टार कैंपेनर होंगी।
  • महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का चेहरा- देश में महिला आरक्षण कानून लागू होने की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच, बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत और मुखर महिला चेहरे की जरूरत है। स्मृति ईरानी इस भूमिका में पूरी तरह फिट बैठती हैं।
  • संसदीय राजनीति में वापसी की तैयारी- संगठन में इस बड़ी जिम्मेदारी के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी जल्द ही उन्हें किसी राज्य से राज्यसभा भेजकर दोबारा विधायी राजनीति के केंद्र में ला सकती है।

‘अगली सुषमा’ या अपनी अलग पहचान?

स्मृति ईरानी (Smriti Irani) की पॉवर में वापसी यह दर्शाती है कि भारतीय राजनीति और विशेषकर बीजेपी में ‘धैर्य और निरंतरता’ का बड़ा इनाम मिलता है। जहाँ तक “अगली सुषमा स्वराज” बनने का सवाल है, तो स्मृति ईरानी भले ही सुषमा जी जैसी सौम्यता और सर्व-स्वीकार्यता न रखती हों, लेकिन सांगठनिक क्षमता, गांधी परिवार के खिलाफ जुझारूपन और वक्तृत्व कला के मामले में वे पूरी तरह से उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। वे खुद को सुषमा स्वराज की ‘कॉपी’ बनाने के बजाय ‘बीजेपी की आधुनिक दौर की सबसे कद्दावर महिला योद्धा’ के रूप में स्थापित कर चुकी हैं।

यह भी पढ़ें: भाजपा संगठन में बड़ा फेरबदल, नितिन नवीन ने घोषित की नई राष्ट्रीय टीम; स्मृति ईरानी-पीयूष गोयल समेत इन दिग्गजों के नाम, देखें पूरी लिस्ट


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