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आखिर कैसे UP में हाशिए पर आ गई कांग्रेस? क्या सच में हो जाएगी विलुप्त

आज़ादी के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी ने यूपी पर राज किया है तो वो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस है। करीब 33 साल तक यूपी में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है, लेकिन अब आलम ये है वही कांग्रेस यूपी में अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही है। एक वक्त ऐसा था जब देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ उत्तर प्रदेश हुआ करता था। जिसे हिलाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। लेकिन आज उसी यूपी में कांग्रेस का बस एक सांसद और दो विधायक बचे हैं।
Lok Sbabha Election 2024 | BJP | Congress | shreshth uttar pradesh |

Lok Sabha Election 2024: देश की राजनीति में कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर ही गुजरता है। प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल से ही यूपी में बीजेपी का दबदबा बढ़ना शुरू हो गया था। उससे पहले बीस साल तक यूपी में क्षेत्रीय दलों ने राज किया, लेकिन क्या आप जानते हैं आज़ादी के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी ने यूपी पर राज किया है तो वो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस है। करीब 33 साल तक यूपी में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है, लेकिन अब आलम ये है वही कांग्रेस यूपी में अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही है।

एक वक्त ऐसा था जब देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ उत्तर प्रदेश हुआ करता था। जिसे हिलाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। आज़ादी के बाद बने पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, उनके दामाद फिरोज़ गांधी, बेटी इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक, पूरा नेहरू-गांधी कुनबा यूपी की सर ज़मीन से ही राजनीति में एंट्री लेता और चुनाव लड़ता आया है। आंकड़े बताते हैं कि पूरे 33 साल यूपी में कांग्रेस ने राज किया है। 1984 में जब इंदिरा गांधी की मौत हुई थी, उस समय कांग्रेस ने 85 में से 83 लोकसभा सीटें जीत कर एक रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन आज उसी यूपी में कांग्रेस का बस एक सांसद और दो विधायक बचे हैं और अब सोनिया गांधी के राजस्थान से राज्यसभा में जाने के फैसले के बाद ना तो लोकसभा में और ना ही ना राज्यसभा में, यूपी में कांग्रेस का एक भी सांसद नहीं बचा है।

मौजूदा दौर यानि 2024 में 403 विधानसभा सीटों वाले यूपी में कांग्रेस के सिर्फ 2 विधायक बचे हैं। यूपी में कांग्रेस के हालात इतने खराब हैं पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को 6.4 प्रतिशत और विधानसभा चुनाव में सिर्फ 2.3 प्रतिशत ही वोट मिले थे। कभी यूपी की सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस इस चुनाव में महज़ 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, जो आजादी के बाद से अब तक सबसे कम आंकड़ा है। आप कह सकते हैं कि यूपी की सियासत से कांग्रेस विलुप्त होने की कगार पर है। आखिर क्या वजह है इसकी क्यों यूपी पर राज करने वाली कांग्रेस आज हाशिए पर आ गई है। इन सब सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें उस दौर में लौटना पड़ेगा, कहां से कांग्रेस यूपी में कमज़ोर होने लगी थी। ये वो वक्त था जब इंदिरा की मौत के बाद राजीव गांधी की सरकार बनी थी। 84 में राजीव की सरकार बनने के बाद कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होने देश के साथ-साथ यूपी में भी कांग्रेस के पतन की नींव रख दी थी।

पहली घटना – साल 1985 का शाहबानो केस

साल 1985-86 का शाहबानों केस तो याद होगा आपको उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से जुड़ी एक याचिका के तहत, तलाक के बाद गुजारे भत्ते के एक मामले में इंदौर की शाहबानो के हक में फैसला सुनाया था। इससे मुस्लिम महिलाएं तो खुश थीं, लेकिन मर्दों को कोर्ट का ये फैसला नागवार गुज़रा। मुस्लिम उलेमाओं ने इसे अपने पर्सनल लॉ में दखल मानते हुए कोर्ट के फैसले का पुरजोर विरोध किया। इससे राजीव गांधी को अपनी सरकार जाने का खतरा लगने लगा था। इसी दबाव में राजीव ने मई 1986 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया, जिसके बाद उनकी सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगे, और हिंदू संगठनों नें उनके विरोध में मोर्चा खोल दिया था, अब हिंदुओं को कैसे मनाया जाए। इसके लिए राजीव गांधी सरकार ने सालों से बंद पड़े राम मंदिर का ताला खुलवा दिया, लेकिन उनका ये दांव भी उल्टा पड़ गया। अब राजीव के इस फैसले से मुस्लिम वोटर्स ने कांग्रेस से दूरी बना ली। इस तरह से कांग्रेस के पाले से हिंदू और मुसलमान दोनों ही निकल गए।

दूसरी घटना – साल 1987 में हुआ बोफोर्स कांड

12 अप्रैल 1987 को राजीव सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने पीएम हाउस जाकर अपना इस्तीफा दे दिया। राजीव उस वक्त अपने घर पर नहीं थे। जैसे ही वो घर आए उन्हे वीपी सिंह का इस्तीफा मिला। राजीव ने बिना कोई सवाल जवाब किए और ना कोई वजह जाने सिंह का इंस्तीफा राष्ट्रपति को भेज दिया। इस घटना की 3-4 दिन बाद स्वीडन रेडियो ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया और आरोप लगाया कि बोफोर्स तोप के सौदे के लिए भारत की टॉप लीडरशिप और रक्षा अधिकारियों को रिश्वत दी गई है। चाय की टपरी से लेकर सियासी गलियारों तक इस खबर ने भूचाल ला दिया था। इस घोटाले के खुलासे से राजीव गांधी सरकार विवादों में घिर गई। उस वक्त वीपी सिंह के दिए इस्तीफे को भी बोफोर्स कांड से जोड़कर देखा गया। इस घटना के एक महीने बाद 16 मई के दिन भरी गर्मी में कांग्रेस ने दिल्ली में एक बड़ी रैली की। मंच पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भाषण दे रहे थे और नीचे कार्यकर्ताओं के छुप कर वीपी सिंह वो भाषण सुन रहे थे। भाषण में राजीव ने कहा भारत की आजादी कब छिनी, जब मीरज़ाफर और जयचंद जैसे गद्दारों ने विदेशी ताकतों से हाथ मिलाया। ऐसे लोगों से आप भी सतर्क रहें। ऐसे लोग विदेशी ताकतों से हाथ मिलाकर देश के हितों को बेच रहे हैं।

भाषण के दौरान राजीव का इशारा साफ तौर पर वीपी सिंह पर ही था, जिसे सुन कर वो काफी नाराज़ हुए, लेकिन बिना कुछ कहे वहां से चल दिए। उन्होंने तय कर लिया कि कांग्रेस को सबक सिखाएंगे। वो राजीव गांधी के खिलाफ बागी तेवर अपना चुके थे। लिहाज़ा उन्होंने गांधी परिवार के करीबी अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान जैसे बड़े कांग्रेसी नेताओं को साथ लेकर जनमोर्चा बनाया। दूसरी तरफ बोफोर्स घोटाले में राजीव के साथ इलाहाबाद से सांसद रहे अमिताभ बच्चन का नाम भी जुड़ गया था, जिससे उनकी इमेज खराब हो रही थी। दबाव में आकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इससे जून 1988 में इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव का ऐलान किया गया। राजीव को चैलेंज करने वाले वीपी सिंह जनमोर्चा की तरफ से और कांग्रेस की तरफ से सुनील शास्त्री मैदान में उतरे। शास्त्री को जिताने के लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन जीत वीपी सिंह को मिली। उसी वक्त कांग्रेस फैजाबाद और मेरठ जिले में हुए उपचुनाव भी हार गई थी।

कांग्रेस का बुरा दौर शुरू हो चुका था। वीपी सिंह राजीव को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होने एक नया हथकंडा अपनाया। वो जिस भी जगह जनसभा करने जाते थे, अपनी जेब से एक कागज़ का टुकड़ा निकाल कर कहते थे- मेरे पास राजीव गांधी के स्विस बैंक का अकाउंट नंबर है। उनके इन भाषणों से राजीव दबाव में आने लगे थे। एक दिन जनसत्ता अखबार में लिखा गया- राजीव के स्विस बैंक अकाउंट का नंबर 99921 पीयू है। इसी में बोफोर्स सौदे के कमीशन से मिले करीब 8 करोड़ रुपए जमा हैं। ये खाता लोटस के नाम पर है। वीपी सिंह के मुताबिक लोटस और राजीव का मतलब एक ही है। वीपी सिंह लगातार ये दावा भी कर रहे थे कि अगर ये बात गलत निकली तो वो राजनीति से संन्यास ले लेंगे। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर अपनी किताब ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में बताते हैं कि वीपी ने बोफोर्स के मुद्दे को जिस तरह उछाला, ये देश की जनता के सामने भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया।

इसका नतीजा ये रहा कि 1984 के लोकसभा में यूपी में 83 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1989 के चुनाव में 15 सीटों पर सिमट कर रह गई और विधानसभा चुनाव में 269 से सीधे 94 सीटों पर आ गिरी। राजीव गांधी की सरकार चली गई और जनता दल के वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होने यूपी में मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया और इस तरह पहली बार केंद्र और यूपी दोनों जगह जनता दल की सरकार बनी औऱ कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा।

1990 का दौर था जब मंडल बनाम कमंडल की राजनीति शुरू हो चुकी थी। बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या के लिए राम रथयात्रा की शुरुआत की। यात्रा आगे बढ़ी तो बिहार में आडवाणी की और लखनऊ में वाजपेयी की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 30 नवंबर 1990 को अयोध्या में भयानक गोलीकांड हुआ, जिसमें 11 कारसेवकों की जान गई। बीजेपी ने मुलायम सिंह पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए और उन्हे मुल्ला मुलायम कहा जाने लगा। दरअसल आजादी के बाद से ही ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित कांग्रेस के कोर वोटर्स हुआ करते थे। इन्ही के दम पर कांग्रेस ने यूपी पर लंबे समय तक राज किया। लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति ने कांग्रेस का किला ध्वस्त कर दिया था। आडवाणी का रथ यात्रा की वजह से ब्राह्मण बीजेपी के पाले में चले गए और मुस्लिम-यादव समाजवादी के पाले में। बचे दलित वोटर्स, तो वो मायावती की बसपा में शिफ्ट हो गए। इस तरह कांग्रेस का कट्टर कोर वोटर टुकड़ों में बंट गया और फिर कांग्रेस कभी यूपी की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। वक्त के साथ-साथ कांग्रेस की सीटें और वोट शेयर घटता चला गया।

अब आपको यूपी में कांग्रेस के खात्में की दो मुख्य वजह बताते हैं। पहली वजह – पॉलीटिकल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कांग्रेस की हार की सबसे बड़ी वजह है कि उसने वक्त के साथ खुदको अपडेट नहीं किया। ना तो वो गांधी परिवार से आगे बढ़कर किसी बड़े नेता को यूपी में उतार सकी और ना ही पहले की तरह बुनियादी स्तर पर अपने कैडर को मज़बूत कर सकी। जैसे आज BJP के लिए RSS ज़मीनी स्तर पर काम करती है, ठीक वैसे ही कभी कांग्रेस के लिए कांग्रेस सेवा दल काम करती थी। इसकी गली-मोहल्लों में अच्छी पकड़ थी। पार्टी के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर काम करते थे, लेकिन कांग्रेस लीडरशिप की अनेदखी की वजह से कांग्रेस सेवा दल धीरे-धीरे खत्म हो गया। नतीजा ये हुए कि अब गांव-कस्बों में कांग्रेस का नाम तक लेने वाला कोई नहीं है।

दूसरी वजह – पॉलीटिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो कांग्रेस ने कभी यूपी में बैठ कर यूपी की राजनीति नहीं की। नेहरू से लेकर सोनिया, राहुल, प्रियंका तक, सभी दिल्ली में बैठ कर यूपी को चलाने की कोशिश करते रहे। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी। और जैसे-जैसे में क्षेत्रीय दलों का उदय होता गया कांग्रेस का जनाधार खत्म होता गया।

अब अंत में सवाल ये खड़ा होता है कि क्या यूपी में कांग्रेस की वापसी हो सकती है या नहीं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए जब ग्राउंड पर जाकर लोगों से बातचीत की गई तो पता चला कांग्रेस यूपी में इस वक्त सबसे खराब दौर से गुजर रही है। लोकल लोगों से बात करके पता चला कि गांधी परिवार की वजह से ही रायबरेली की देश में पहचान बनी है। इसी वजह से अब भी कुछ लोग रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखते हैं, लेकिन किसी नेता के ज़मीन पर ना दिखने से नाराज़ हैं। राहुल-प्रियंका भी चुनाव के वक्त ही नज़र आते हैं फिर दोनों जिलों को भूल जाते हैं। यूपी की आम जनता का मानना है कि जिस तरह कांग्रेस अभी चुनाव लड़ रही है उससे लगता वो बीजेपी के आगे घुटने टेक चुकी है। सिर्फ चुनाव के वक्त ही अमेठी या रायबरेली की चर्चा होती है। आखिर कब तक इंदिरा और राजीव गांधी की बोई फसल को काटेगी कांग्रेस।

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