UP Politics: उत्तर प्रदेश की सत्ता का एक ही स्वर्णिम नियम रहा है- दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है और लखनऊ की गद्दी का ताला वही खोलता है, जिसे राज्य के सबसे प्रभावशाली सामाजिक और बौद्धिक वर्ग, यानी ब्राह्मण समाज का समर्थन हासिल होता है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए उत्तर प्रदेश में यह समाज केवल एक पारंपरिक वोट बैंक नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक नींव, सामाजिक स्वीकार्यता और संगठनात्मक मजबूती की असली रीढ़ रहा है।
UP Politics: पुराने ब्राह्मण चेहरों की उपेक्षा और ‘आयातित’ नेताओं पर दांव
हालांकि, हाल के वर्षों और विशेष रूप से 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने साफ संकेत दिया है कि अपने पुराने, वफादार और कैडर-स्वीकार्य ब्राह्मण चेहरों को दरकिनार कर अन्य दलों से आए नेताओं पर अत्यधिक भरोसा करने की रणनीति पार्टी के लिए बेहद आत्मघाती साबित हुई है। हालाँकि इस मामले में बीजेपी ने केवल अपने ब्राम्हण नेताओं को ही प्रेक्षित नहीं किया बल्कि अन्य जातियों के कई कद्दावर नेताओं को साइडलाइन कर दिया गया। उनमें सिद्धार्थनाथ सिंह, श्रीकांत शर्मा, महेंद्रनाथ सिंह समेत कई नेता शामिल हैं जिनके कार्यकाल में बीजेपी सरकार की काफी सराहना हुई।
जिन्होंने यूपी में बीजेपी की जमीन बनाई, उन्हीं चेहरों से दूरी ने बढ़ाई चुनावी मुश्किलें
इसके अलावा बीजेपी ने अपने कोर थिंकटैंक और संभ्रांत कोर वोटर ब्राम्हणो को कई तरह से नाराज करके मानो खुद ही अपने नुकसान का खाका खींच लिया। उत्तर प्रदेश में जनसंघ के दिनों से लेकर बीजेपी के सत्ता के शिखर तक पहुँचने की यात्रा में ब्राह्मण नेताओं की केंद्रीय भूमिका रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, बृम्हदत्त द्विवेदी से लेकर वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र जैसे नेताओं ने राज्य में पार्टी की जो वैचारिक और सामाजिक ज़मीन तैयार की, उसे आगे बढ़ाने में डॉ. दिनेश शर्मा जैसे कद्दावर नेताओं का अमूल्य योगदान रहा। नई पीढ़ी में पंडित श्रीकांत शर्मा ने भी बीजेपी की सरकार में ऊर्जा मंत्री रहते हुए अभूतपूर्व योगदान दिया। (UP Politics)
इन नेताओं की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इन्होंने केवल अपने समाज को ही पार्टी से जोड़े नहीं रखा, बल्कि अपनी सौम्य, समावेशी और सर्वसमावेशी छवि के बदौलत गैर-बीजेपी वर्गों और यहाँ तक कि मुस्लिम समुदाय के बीच भी पार्टी की पैठ और स्वीकार्यता बनाई।
डॉ. दिनेश शर्मा से श्रीकांत शर्मा तक: पुराने भरोसेमंद चेहरों को दरकिनार करने का बीजेपी को नुकसान
जैसे वर्तमान में राज्यसभा सांसद एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा पिछले कई चुनावी अभियानों के मुख्य शिल्पकार और प्रशासनिक सुधारक रहे। पार्टी के संगठनात्मक और चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो डॉ. दिनेश शर्मा का योगदान बेमिसाल रहा है। उन्होंने राज्यभर में धुआंधार प्रचार कर बीजेपी को एक के बाद एक ऐतिहासिक जीत दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई:
2017 विधानसभा चुनाव: डॉ. दिनेश शर्मा ने राज्यभर में 160 से अधिक ताबड़तोड़ हेलीकॉप्टर सभाएं कीं। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी ने अभूतपूर्व प्रचंड बहुमत हासिल किया। (UP Politics)
2019 लोकसभा चुनाव: पुनः महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने 150 से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया, जिससे बीजेपी ने प्रदेश में बंपर जीत दर्ज की।
2022 विधानसभा चुनाव: चुनाव अभियान की कमान संभालते हुए उन्होंने पूरे यूपी में रिकॉर्ड 245 बैठकें और जनसभाएं कीं, जिसने सत्ता में बीजेपी की वापसी को आसान बनाया।
कोर कैडर से दूरी, बाहरी नेताओं पर भरोसा: यूपी में बीजेपी की रणनीति पर उठे सवाल
चुनावी प्रचार के साथ-साथ उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में यूपी की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुए। नकल माफिया पर शिकंजा कसने, यूपी बोर्ड के सत्र को नियमित करने और डिजिटलाइजेशन जैसे ऐतिहासिक सुधारों की गूंज देश की संसद तक पहुंची।
तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी संसद में यूपी के इन शिक्षा सुधारों और नीट (NEET) से जुड़े उनके फॉर्मूलों की खुलकर तारीफ की थी। लेकिन साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी से संगठनात्मक स्तर पर एक बड़ी रणनीतिक चूक हुई। जिस राज्य (यूपी) में अपने कोर संगठन और पुराने जमीनी चेहरों की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहां डॉ. दिनेश शर्मा जैसे स्थापित और व्यापक जनाधार वाले नेताओं का सही इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें महाराष्ट्र के मोर्चे पर भेज दिया गया। (UP Politics)
इस रणनीतिक प्रबंधन के कारण महाराष्ट्र में पार्टी का प्रदर्शन तो बेहतरीन रहा, लेकिन यूपी में संगठन की पकड़ ढीली पड़ गई और चुनावी नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। ऐसे ही यूपी सरकार में जब तक पंडित श्रीकांत शर्मा ऊर्जा मंत्री थे बिजली विभाग के काम करने की खूब तारीफ होती रही। आम लोगों और संगठन में भी उनकी छवि एक सहज सुलभ और हाई एनर्जी वाले नेता की रही। लेकिन जब दोबारा सरकार बनी तो उनका पत्ता काट दिया गया।
2022 के चुनाव आते आते बीजेपी पर बाहरी और आयातित नेताओं का वर्च्स्व बढ़ता गया। कहीं कहीं तो ऐसा लगा कि आंख बंद करके फ़ैसले कर दिये गए। बीजेपी ने अपने मूल कार्यकर्ताओं और वफादार ब्राह्मण नेताओं पर भरोसा जताने के बजाय दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को अचानक बड़ा कद और पद दे दिया। (UP Politics)
जैये कांग्रेस में हाशिए पर जा चुके जितिन प्रसाद जो कि कांग्रेस में लगातार दो चुनाव हार चुके थे। जब बीजेपी में आए तो उनको सीधे पीडब्ल्यूडी विभाग दे दिया गया वो भी बिन विधायक बनाए। बीएसपी में लम्बे समय तक रहे बृजेश पाठक के पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें सीधे उप-मुख्यमंत्री जैसे भारी-भरकम पद से नवाजा दिया गया। ऐसा ही उदाहरण सपा से आए मनोज पांडेय का रहा। समाजवादी पार्टी (SP) से बीजेपी में शामिल करवाकर सीधे मंत्री पद और बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारियों से सुसज्जित किया गया।
नतीजा ये हुआ कि कैडर में असंतोष और खिसकता पारंपरिक कोर वोटर
अन्य दलों से आए इन नेताओं को अत्यधिक तवज्जो देने का कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ बीजेपी को चुनावों में नहीं मिला। इसके विपरीत, पार्टी का मूल कार्यकर्ता और पारंपरिक ब्राह्मण वोटर खुद को उपेक्षित महसूस करने लगा। आयातीत नेता व्यक्तिगत पद और सत्ता हासिल करने में भले ही सफल रहे, लेकिन वे पारंपरिक कैडर, संघ निष्ठावानों और आम जनता के बीच वह भरोसा कायम नहीं कर सके जो डॉ. दिनेश शर्मा या कलराज मिश्र, महेंद्रनाथ पांडे जैसे पुराने संघी और वफादार चेहरों का था।
नतीजा ये हुआ अपने स्थापित नेताओं को हाशिए पर धकेले जाने और बाहरी नेताओं के प्रभुत्व से नाराज होकर बीजेपी का वफादार कोर ब्राह्मण मतदाता धीरे-धीरे पार्टी से छिटकने लगा, जिसका सीधा नुकसान 2024 के चुनावी आंकड़ों में सीटों की भारी गिरावट के रूप में स्पष्ट दिखाई दिया। (UP Politics)
उत्तर प्रदेश की राजनीति यह साफ दर्शाती है कि केवल सत्ता में बने रहने के लिए अन्य दलों के असंतुष्ट या हारे हुए नेताओं को शामिल करना और उन्हें शीर्ष पद देना दीर्घकालिक सफलता की गारंटी नहीं हो सकता। बीजेपी की वास्तविक ताकत उसके वे पुराने वफादार चेहरे हैं, जिन्होंने दशकों की तपस्या और वैचारिक प्रतिबद्धता से पार्टी का आधार खड़ा किया है।
अपने पुराने वफादार और सर्वस्वीकार्य, प्रशासनिक रूप से सक्षम और संगठनात्मक रूप से सिद्ध नेताओं की उपेक्षा और 2024 में यूपी के मुख्य चुनावी समर से उन्हें दूर रखने का खामियाजा पार्टी ने भुगता है। बीजेपी के लिए यह बेहद जरूरी सबक है कि अपने कोर कैडर को सहेजने और पारंपरिक जनाधार को वापस पाने के लिए उसे अपने पुराने, जमीनी और विश्वसनीय चेहरों पर ही पुनः भरोसा जताना होगा। (UP Politics)











