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नीतीश कुमार ने गरीब परिवारों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की

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राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की विपक्ष की मांग पर एक और प्रहार करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार 7 नवंबर को सामाजिक-आर्थिक डेटा जारी करने के तुरंत बाद राज्य में गरीब परिवारों के लिए कई कल्याणकारी लाभों की घोषणा की। पिछले महीने बिहार सरकार द्वारा अपना जाति सर्वेक्षण जारी करने के बाद सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था।

आंकड़ों से पता चला कि लगभग 94 लाख परिवार – बिहार के कुल 2.76 करोड़ परिवारों में से 34.13% – आर्थिक रूप से गरीब हैं और प्रति माह 6,000 रुपये से कम कमाते हैं।

इसके बाद नीतीश ने 65% सरकारी नौकरियों और शिक्षा को ओबीसी, एससी और एसटी के लिए आरक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति को 20% आरक्षण मिलना चाहिए। जबकि ओबीसी और ईबीसी को मिलाकर 43% आरक्षण मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि शेष 2% एसटी के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। ऊंची जातियों के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10% आरक्षण के साथ यदि यह कदम लागू होता है तो सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में एक चौथाई सीटें आरक्षित हो जाएंगी।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 6,000 रुपये प्रति माह से कम कमाने वाले 94 लाख परिवारों को एकमुश्त वित्तीय सहायता के रूप में 2 लाख रुपये प्रदान किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आर्थिक रूप से गरीबों के लिए अगले पांच वर्षों में 2.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी। इनमें से जो परिवार बेघर हैं उन्हें अतिरिक्त 40,000 रुपये दिए जाएंगे।

आंकड़ों से पता चलता है कि गरीब परिवारों का सबसे ज्यादा अनुपात अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में था। एससी समुदायों के परिवारों में जो राज्य में कुल आबादी का 19.65% हैं, 42.93% गरीब हैं। राज्य की छोटी सी एसटी आबादी में से केवल 1.68%, 42.7% गरीब हैं।

आंकड़ों से पता चलता है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत लगभग 33.16% परिवार गरीब हैं और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के रूप में वर्गीकृत 33.58% परिवार गरीब हैं। सर्वेक्षण के जातिगत आंकड़ों से पता चला कि जहां ओबीसी राज्य की आबादी का 27.13% है वहीं ईबीसी 36.01% है। उच्च जाति के परिवारों में जो जनसंख्या का 15.52% हैं, 25.09% गरीब हैं।

ओबीसी में प्रमुख यादव जाति में सबसे अधिक गरीब आबादी बताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक तिहाई यादव जो बिहार की आबादी का 14.26% हैं गरीब हैं। कुशवाह (कोइरी) जाति के 34.32% परिवार गरीब हैं।

अनुसूचित जाति में मुसहरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सबसे खराब है। मुसहरों के 8,73,281 परिवारों में से लगभग 54.56% गरीब हैं। भुइयां समुदाय में 53.55% परिवार गरीब हैं। इसी तरह डोम और भोगता समुदाय के 50% से अधिक परिवार गरीबी में जी रहे हैं।

ऊंची जातियों में गरीब परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा भूमिहारों में है। जबकि जाति जनगणना के आंकड़ों से पता चला है कि भूमिहार राज्य की आबादी का 2.86% हैं, उनमें से 27.58% गरीब हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में ब्राह्मण आबादी का एक चौथाई (कुल आबादी का 3.65%) गरीब है। एक चौथाई राजपूत भी गरीब हैं।

मुसलमानों में शेरशाहबादी और धुनिया समुदायों – जिन्हें ईबीसी के रूप में वर्गीकृत किया गया है 31.99% और 31.42% परिवार गरीबी में जी रहे हैं। मोमिन जाति के लगभग 26.77% परिवार और रेन या कुंजड़ा के 29.67% परिवार भी गरीब हैं।

पिछड़े वर्गों में, सुरजापुरी मुसलमानों में गरीब परिवारों का प्रतिशत सबसे अधिक (29.33) है। उच्च जाति के मुसलमानों में लगभग 25.84% शेख परिवार गरीब हैं। जबकि पठान जाति में लगभग 22.20% परिवार गरीब हैं और 17.61% सैयद परिवार गरीबी में रहते हैं।

बिहार की कुल आबादी 13.07 करोड़ है जिसमें से 20.47 लाख लोग सरकारी नौकरियों में हैं। इन 20.49 लाख लोगों में से 6.41 लाख व्यक्ति उच्च जाति से हैं, 6.21 लाख व्यक्ति ओबीसी समुदाय से हैं ,4.61 लाख व्यक्ति ईबीसी समुदाय से हैं, 2.91 लाख व्यक्ति एससी समुदाय से हैं और 30,164 व्यक्ति एसटी समुदाय से हैं।

जबकि उच्च जातियाँ कुल आबादी का 15% हैं लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व अधिक है।

शिक्षा के मोर्चे पर भी पिछड़े समुदाय पिछड़ रहे हैं। ऊंची जातियों में 13.41% ग्रेजुएट हैं। बीसी में केवल 6.77% हैं जबकि ईबीसी में केवल 4.27% हैं। अनुसूचित जाति में केवल 3.05% आबादी स्नातक है।

बिहार उन राज्यों में से है जहां कम वेतन वाली नौकरियों के लिए बड़े पैमाने पर पलायन होता है। ताजा आंकड़ों से पता चला है कि बिहार के करीब 46 लाख लोग रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में रह रहे हैं, जबकि 5.52 लाख लोग पढ़ाई के लिए बाहर रह रहे हैं।

आंकड़ों से पता चला कि ऊंची जातियों की केवल 11.44% आबादी मजदूर और राजमिस्त्री है जबकि बीसी की 13.74%, ईबीसी की 18.62%, एससी की 21.38% और एसटी की 18.51% आबादी मजदूर और राजमिस्त्री के रूप में काम कर रही है।

सामाजिक-आर्थिक डेटा जारी होने के बाद बिहार सरकार ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। वर्तमान में, एससी, एसटी और ओबीसी के लिए 50% आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई सीमा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ईडब्ल्यूएस के लिए 10% को छोड़कर आरक्षण को 65% तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक, अनुसूचित जाति को 20 फीसदी और ओबीसी व ईबीसी को मिलाकर 43 फीसदी आरक्षण मिलेगा। एसटी को 2% आरक्षण मिलेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि ओबीसी को भी उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण मिलना चाहिए। इसलिए 50 फीसदी की सीमा खत्म की जानी चाहिए और कोटा बढ़ाकर 65 फीसदी किया जाना चाहिए।

मंडल पार्टियां लंबे समय से यह तर्क देती रही हैं कि उचित जाति जनगणना से सरकार को वैज्ञानिक तरीके से कल्याण लाभ पहुंचाने में मदद मिल सकती है। कांग्रेस भी अब इस मुहिम में शामिल हो गई है और उसने सत्ता में आने पर बिहार की तर्ज पर देशव्यापी जाति जनगणना और राज्य स्तरीय जाति सर्वेक्षण कराने का वादा किया है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि गरीबी और शिक्षा के आंकड़ों ने नीतीश कुमार के उन दावों की पोल खोल दी है कि उन्होंने अपने 15 साल के शासनकाल में विकास किया है।

नवल किशोर चौधरी ने द वायर से कहा ”डेटा साफ कहता है कि बिहार में गरीबी और बेरोजगारी है। लगभग 63.74% परिवार प्रति माह 10,000 रुपये से कम कमाते हैं – जिसका अर्थ है कि वे प्रतिदिन 500 रुपये भी नहीं कमा रहे हैं। इसका मतलब है कि बिहार में भयंकर गरीबी है।” उन्होंने कहा “नीतीश कुमार ने विकास को लेकर जो भी दावा किया है मौजूदा आंकड़े उसका समर्थन नहीं कर रहे हैं।”

2021 नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के आंकड़ों में कहा गया है कि बिहार में 51.91% आबादी गरीब थी जो सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है। जबकि नीति आयोग की रिपोर्ट में कई संकेतकों को ध्यान में रखा गया था। जाति जनगणना के आंकड़े सिर्फ मासिक आय पर आधारित थे।

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