लद्दाख की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर डटे Environmentalist सोनम वांगचुक के अनशन को अब 18 दिन पूरे हो चुके हैं। डॉक्टरों की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस लंबी भूख हड़ताल के कारण उनका वजन करीब 8.5 किलो तक गिर गया है। इसके साथ ही उनका ब्लड प्रेशर (BP) भी काफी नीचे जा चुका है और शरीर में लगातार कमजोरी बढ़ती जा रही है।
बाहर से देखने पर हमें सिर्फ एक कमजोर होता हुआ इंसान नजर आता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से देखें तो Sonam Wangchuk Hunger Strike के तहत शरीर के भीतर एक बेहद जटिल और खतरनाक जंग चल रही होती है। जब कोई व्यक्ति इतने दिनों तक अन्न का एक दाना भी नहीं लेता, तो उसका शरीर खुद को जिंदा रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश शुरू कर देता है।
शुरुआती 48 घंटे: शरीर का पहला बैकअप और ग्लाइकोजन का इस्तेमाल
भूख हड़ताल के पहले और दूसरे दिन इंसान को तेज भूख और हल्की कमजोरी महसूस होती है। लेकिन शुरुआती 24 से 48 घंटों तक हमारा शरीर अपने खुद के बैकअप प्लान पर काम करता है। हमारे लीवर और मांसपेशियों (Muscles) में ग्लाइकोजन (Glycogen) नाम का एक एनर्जी रिजर्व जमा रहता है।
जब बाहर से भोजन मिलना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो शरीर सबसे पहले इसी ग्लाइकोजन को तोड़कर ग्लूकोज में बदलता है। यही ग्लूकोज दिमाग और दिल को शुरुआती ऊर्जा देता है। हालांकि, यह रिजर्व बहुत सीमित होता है और लगभग दो दिनों के भीतर पूरी तरह खत्म हो जाता है।
जब शुरू होता है कीटोसिस: फैट बर्निंग और सर्वाइवल मोड
ग्लाइकोजन खत्म होने के बाद शरीर को समझ आ जाता है कि बाहर से खाने की कोई आपूर्ति नहीं होने वाली है। ऐसे में आपातकालीन स्थिति को देखते हुए शरीर ‘इमरजेंसी सर्वाइवल मोड’ में चला जाता है। यहां से Sonam Wangchuk Hunger Strike Science का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है, जिसे चिकित्सा की भाषा में ‘कीटोसिस’ (Ketosis) कहा जाता है।
अब शरीर ऊर्जा के लिए ग्लूकोज के बजाय शरीर में पहले से जमा अतिरिक्त चर्बी (Fat) को पिघलाना शुरू कर देता है। फैट के टूटने से लीवर में ‘कीटोन्स’ (Ketones) बनते हैं, जो शरीर और विशेष रूप से दिमाग के लिए नया ईंधन बन जाते हैं। 18 दिन के अनशन तक पहुंचते-पहुंचते सोनम वांगचुक का शरीर पूरी तरह इसी मोड पर काम कर रहा है, जिसके कारण उनका वजन इतनी तेजी से गिरा है।
मसल्स ब्रेकडाउन: जब शरीर खुद की मांसपेशियों को खाने लगता है
शरीर के भीतर जमा चर्बी हमेशा के लिए नहीं होती है। जब भूख हड़ताल बहुत लंबी खिंच जाती है और फैट का स्टॉक भी खत्म होने की कगार पर पहुंच जाता है, तब शरीर जीवित रहने के लिए अपनी ही मांसपेशियों (Proteins) को तोड़ना शुरू कर देता है। सरल शब्दों में कहें तो शरीर खुद को जिंदा रखने के लिए अपने ही अंगों को खाने लगता है।
यही कारण है कि लंबी भूख हड़ताल पर बैठे लोगों की बाहें बहुत पतली दिखने लगती हैं, पसलियां बाहर आ जाती हैं और चेहरा अंदर धंस जाता है। 18वें दिन के बाद डॉक्टरों की सबसे बड़ी चिंता इसी ‘मसल लॉस’ (Muscle Loss) को लेकर होती है। क्योंकि जब मांसपेशियां टूटने लगती हैं, तो शरीर की बुनियादी ढांचागत ताकत खत्म होने लगती है और इंसान के लिए उठना-बैठना भी दूभर हो जाता है।
लो ब्लड प्रेशर और दिल पर बढ़ता दबाव: कैसे काम करता है एनर्जी सेवर मोड?
जब शरीर को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती, तो वह अपने कामकाज की रफ्तार को धीमा कर देता है ताकि बची हुई ऊर्जा को दिल और दिमाग जैसे सबसे जरूरी अंगों के लिए सुरक्षित रखा जा सके। यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे हमारे मोबाइल फोन की बैटरी कम होने पर वह खुद-ब-खुद ‘पावर सेविंग मोड’ में चला जाता है।
इसके चलते दिल की धड़कन (Heart Rate) धीमी हो जाती है और रक्तचाप (Blood Pressure) काफी नीचे गिर जाता है। सोनम वांगचुक का लगातार गिरता बीपी इसी शारीरिक बदलाव का नतीजा है। लो बीपी के कारण मरीज को लगातार चक्कर आते हैं, आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है और अचानक बेहोश होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
इलेक्ट्रोलाइट्स का बिगड़ता संतुलन: दिल की धड़कन रुकने का खतरा
लंबी भूख हड़ताल के दौरान डॉक्टरों की सबसे बड़ी नजर केवल वजन पर नहीं होती है। चिकित्सा विज्ञान यानी Sonam Wangchuk Hunger Strike Science के अनुसार, इस दौरान शरीर में सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी मिनरल्स (Electrolytes) का संतुलन बिगड़ने का खतरा सबसे अधिक होता है।
ये इलेक्ट्रोलाइट्स ही हमारी नसों, मांसपेशियों और विशेष रूप से दिल की धड़कन की लय (Rhythm) को नियंत्रित करते हैं। यदि खून में पोटैशियम का स्तर बहुत ज्यादा गिर जाए, तो दिल की धड़कन अचानक अनियमित हो सकती है, जिससे कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर मेडिकल इमरजेंसी पैदा हो सकती है। यही वजह है कि डॉक्टरों की टीम दिन में कई बार उनके ब्लड सैंपल लेकर इन मानकों की जांच कर रही है।
दिमाग की जंग: ग्लूकोज की कमी और सुस्ती का असर
हमारा मस्तिष्क पूरे शरीर की तुलना में सबसे ज्यादा ऊर्जा (करीब 20 प्रतिशत) की खपत करता है। सामान्य दिनों में दिमाग केवल ग्लूकोज की मदद से काम करता है। लेकिन अनशन के इस दौर में ग्लूकोज की भारी कमी हो जाने के कारण उसे कीटोन्स पर निर्भर रहना पड़ता है।
कीटोन्स से दिमाग काम तो करता रहता है, लेकिन इसकी एक सीमा होती है। इस वजह से अनशनकारी को भयंकर सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, मानसिक थकान और लगातार सुस्ती महसूस होने लगती है। यह स्थिति दिखाती है कि लड़ाई सिर्फ शारीरिक स्तर पर नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी कितनी कठिन होती जा रही है।
कमजोर इम्यून सिस्टम और किडनी-लीवर पर पड़ता एक्स्ट्रा लोड
18 दिन तक भूखे रहने के बाद शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता (Immunity) बेहद कमजोर हो जाती है। शरीर का पूरा ध्यान केवल जीवित रहने पर केंद्रित होने के कारण नई प्रतिरक्षा कोशिकाएं (Immune Cells) बनना लगभग बंद हो जाती हैं। ऐसे में मामूली सा संक्रमण या सर्दी-खांसी भी अनशनकारी के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
इसके अलावा, जब शरीर लगातार अपने ही फैट और प्रोटीन को तोड़ रहा होता है, तो उससे निकलने वाले टॉक्सिन्स को साफ करने के लिए किडनी और लीवर को अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा काम करना पड़ता है। लंबे समय तक पानी और भोजन न मिलने से किडनी फेल्योर (Kidney Failure) का खतरा भी लगातार मंडराता रहता है।
आंदोलन के पीछे की शारीरिक कीमत और डॉक्टरों की कड़ी निगरानी
कुल मिलाकर देखें तो सोनम वांगचुक का अनशन अब उस नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका है जहां शरीर की सहनशक्ति अपनी आखिरी सीमाओं को छू रही है। बाहर से देखने वालों के लिए यह केवल ’18 दिनों से खाना न खाना’ हो सकता है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान की नजर में यह शरीर के हर एक अंग का खुद को बचाए रखने का अंतिम संघर्ष है।
Sonam Wangchuk Hunger Strike Science की यह पूरी रिपोर्ट हमें बताती है कि एक अनशनकारी अपने विचारों और मांगों के लिए अपने शरीर की कितनी बड़ी कीमत चुकाता है। लगातार गिरता वजन, लो बीपी और मसल्स का टूटना इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि अब उनके शरीर के मुख्य अंगों पर दबाव खतरनाक स्तर तक बढ़ चुका है। यही वजह है कि मेडिकल टीम चौबीसों घंटे उनकी हालत पर नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी अनहोनी से समय रहते बचा जा सके।











