US Iran 60 Days Ceasefire Israel Threat: युद्ध कुछ समय के लिए रुका है। लेकिन, क्या यह सच में खत्म हुआ है? या फिर 60 दिनों की यह घड़ी किसी और बड़े तूफान की उलटी गिनती शुरू कर चुकी है? अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रही सीधी जंग फिलहाल थम गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। दूसरी तरफ, ईरान भी खुद को झुका हुआ दिखाने के मूड में कतई नहीं है। हालांकि, अगर पूरे मामले को गहराई से देखें, तो यह कोई परमानेंट पीस डील नहीं है। यह सिर्फ 60 दिनों का एक अस्थायी सीजफायर (युद्धविराम) है।
ट्रंप ने अचानक क्यों बदला रुख? हॉर्मुज जलडमरूमध्य का ‘ऑयल प्रेशर’
कुछ महीने पहले तक डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर कड़े सैन्य एक्शन की बात कर रहे थे। फिर अचानक, युद्ध रोकने और समझौते की मेज पर आने की नौबत क्यों आई?
- ग्लोबल इकोनॉमी का संकट: इसकी सबसे बड़ी वजह हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) है। दुनिया का एक बड़ा तेल और गैस सप्लाई इसी रास्ते से गुजरता है।
- महंगाई का डर: जंग की वजह से इस रूट पर जहाजों पर खतरा बढ़ गया था। परिणामस्वरूप, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं।
- घरेलू राजनीति का गणित: अगर तेल लगातार महंगा होता, तो अमेरिकी जनता को महंगा पेट्रोल मिलता। जाहिर है कि बढ़ती महंगाई का सीधा राजनीतिक नुकसान खुद ट्रंप को उठाना पड़ता।
इसके अलावा, अमेरिका ने जंग की शुरुआत में जो लक्ष्य तय किए थे, वे अधूरे रह गए। ईरान की न्यूक्लियर एक्टिविटी पूरी तरह बंद नहीं हुई और न ही वहां की सत्ता बदली। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अमेरिका ने युद्ध तो रोका है, लेकिन उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि नहीं लगी है।US Iran 60 Days Ceasefire Israel Threat
ईरान का रुख: “दबाव के आगे घुटने नहीं टेकेंगे”
ईरान इस समय खुद को मजबूत स्थिति में देख रहा है। उसका मानना है कि उसने अमेरिका और इजरायल दोनों का साझा दबाव झेला, लेकिन अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं किया।
- वक्त का फायदा: ईरानी नेताओं को लगता है कि समय उनके पक्ष में है। दरअसल, अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन (मध्यावधि चुनाव) आने वाले हैं।
- रणनीति: चुनाव के दबाव को देखते हुए ट्रंप दोबारा कोई बड़ा युद्ध शुरू करने का जोखिम नहीं लेंगे। इसीलिए, ईरान इस बातचीत को लंबा खींचने की कोशिश कर सकता है।
सबसे बड़ा ट्विस्ट: नेतन्याहू ने ट्रंप की लाइन से अलग खींची लकीर
इस पूरे समझौते में अगर कोई सबसे ज्यादा असहज दिखाई दे रहा है, तो वह है इजरायल। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ शब्दों में कह दिया है कि “संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।”
- सुरक्षा से समझौता नहीं: नेतन्याहू का यह बयान बेहद गंभीर है। ट्रंप जहाँ शांति की बात कर रहे हैं, वहीं नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए अकेले भी कार्रवाई जारी रखेगा।
- पीछे हटने से इनकार: उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इजरायल गाजा, लेबनान और सीरिया में अपनी सैन्य मौजूदगी को तुरंत खत्म नहीं करने जा रहा है।
- सोच में अंतर: पहली बार ऐसा लग रहा है कि वाशिंगटन (अमेरिका) और तेल अवीव (इजरायल) के बीच मिडिल ईस्ट को लेकर सोच अलग हो चुकी है। ट्रंप फिलहाल तेल बाजार को स्थिर रखना चाहते हैं, जबकि नेतन्याहू ईरान के खतरे को जड़ से मिटाना चाहते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दोनों अलग हो गए हैं। इजरायल आज भी हथियारों और डिप्लोमैटिक सपोर्ट के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर है।
अगले 60 दिन: सामने आ सकते हैं ये 3 बड़े सिनैरियो
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों के मुताबिक, अगले दो महीनों में तीन मुख्य परिस्थितियां बन सकती हैं:
| सिनैरियो | स्थिति | संभावित परिणाम |
| पहला सिनैरियो | बातचीत पूरी तरह सफल रहे | ईरान परमाणु कार्यक्रम पर झुकेगा, अमेरिका प्रतिबंध हटाएगा और दुनिया को तेल संकट से बड़ी राहत मिलेगी। |
| दूसरा सिनैरियो | बातचीत बेनतीजा खिंचती रहे | कोई ठोस नतीजा नहीं निकलेगा, लेकिन सीजफायर की अवधि को आगे के लिए बढ़ा दिया जाएगा। |
| तीसरा सिनैरियो (खतरनाक) | बातचीत पूरी तरह टूट जाए | कोई प्रॉक्सी ग्रुप हमला कर दे या इजरायल अकेले सैन्य एक्शन ले ले। परिणामस्वरूप, पूरा मिडिल ईस्ट भयानक महायुद्ध में झुलस जाएगा। |
युद्ध खत्म हुआ है या सिर्फ ‘Pause’ हुआ है?
फिलहाल बंदूकें जरूर खामोश हैं, लेकिन भरोसे की कमी अभी भी बरकरार है। दरअसल, सीजफायर का मतलब हमेशा स्थायी शांति नहीं होता। कई बार यह अगले दौर की भीषण जंग की तैयारी का एक ब्रेक मात्र होता है। अंततः, इस त्रिकोणीय खेल में तीन खिलाड़ी हैं—ट्रंप, ईरान और नेतन्याहू। तीनों ही अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि अगले 60 दिनों की यह मेज दुनिया को शांति की ओर ले जाती है या फिर एक नए और विनाशकारी युद्ध की तरफ।



